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बुल्ले शाह की जीवनी(Bulle Shah Life History)

बुल्ले शाह की जीवनी(Bulle Shah Life History)


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BULLEH SHAH


बुल्ले शाह का जन्म का नाम अब्दुल शाह था | इनका जन्म 1680 में हुआ | बुल्ले शाह एक पंजाबी सूफी संत एवं कवि थे | बुल्ले शाह की कविताओं को काफिया भी कहा जाता है | बुल्ले शाह के पिता जी का नाम शाह मोहम्मद था, जो कि एक दरवेश थे | 

बुल्ले शाह ने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने पिता से ग्रहण की और उच्च शिक्षा कसूर में ख्वाजा गुलाम मुर्तजा से ली थी |  पंजाबी कवि वारिस शाह ने भी ख्वाजा गुलाम मुर्तजा से ही शिक्षा ली थी |

बुल्ले शाह के सूफी गुरु शाह इनायत थे | बुल्ले शाह का परिवार पैगंबर मोहम्मद का वंशज होने की वजह से ऊंची सैयद जात का था,जबकि शाह इनायत जात से आराइन थे |  आराइन को उस समय नीची जात माना जाता था | लेकिन बुल्लेशाह अपने परिवार और रिश्तेदारों के बहुत सारे विरोध के बाद भी अपने मुरशद इनायत शाह से जुड़े रहे | 

अपनी एक कविता में बुल्ल्ह शाह ने लिखा है


बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ भैनाँ ते भरजाईयाँ 
'मन्न लै बुल्लेया साड्डा कैहना, छड्ड दे पल्ला राईयाँ 
आल नबी, औलाद अली, नूँ तू क्यूँ लीकाँ लाईयाँ?' 
'जेहड़ा सानू सईय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सज़ाईयाँ 
जो कोई सानू राईं आखे, बहिश्तें पींगाँ पाईयाँ 
राईं-साईं सभनीं थाईं रब दियाँ बे-परवाईयाँ 
सोहनियाँ परे हटाईयाँ ते कूझियाँ ले गल्ल लाईयाँ 
जे तू लोड़ें बाग़-बहाराँ चाकर हो जा राईयाँ 
बुल्ले शाह दी ज़ात की पुछनी? शुकर हो रज़ाईयाँ'


उन्होंने कहा बुल्ले को समझाने बहने और भाभी आए हैं,  उन्होंने कहा हमारा कहना मान बुल्ले आराइनो का साथ छोड़ दे | नबी के परिवार और अली के मुर्शदों को क्यों कलंकित करता है |
तो बुल्ले ने कहा जो मुझे सैयद बुलाएगा उसे नरक में सजा मिलेगी, जो मुझे आराइन कहेगा उसे स्वर्ग के सुहावने झूले मिलेंगे | 
आराइन और सैयद इधर-उधर पैदा होते रहते हैं परमात्मा को जात की प्रवाह नहीं | वह वह खूबसुरतो को परे धकेलता है  और बदसूरतो को गले लगाता है | 
बुल्ले की जात क्या पूछता है, अगर तू स्वर्ग चाहता है, तो आराइनो का नौकर बन जा |
भगवान की बनाई दुनिया के लिए शुक्र मना | 

बुल्ले शाह ने पंजाबी में कविताएं लिखी जिन्हे एक काफियां कहां जाता है | काफीओं में उन्होंने बुल्ले शाह का प्रयोग किया है | बुल्ले शाह के जीवन में बहुत सारी रोचक प्रसंग हैं | लेकिन एक तथ्य जिसकी चर्चा हर जगह होती है तो आइए जानते हैं क्या है वह प्रसंग:-


1 दिन बुल्ले शाह अपने गुरु शाह इनायत जी के पास बगीचे में पहुंचे | शाह इनायत जी अपने कार्य में इतने लीन थे कि उन्हें बुल्लेशाह के आने की कोई खबर नहीं थी | बुल्ले शाह उस बगीचे में लगे हुए आमो को देख रहे थे | गुरु जी ने बुल्लेशाह से पूछा क्या यह आम आप ने तोड़े हैं ?

बुल्ले शाह ने कहा “ना तो मैं पेड़ पर चढ़ा और ना ही पत्थर फैंके भला मैं कैसे आम तोड़ सकता हूं” | गुरु जी ने बुल्ले शाह को ऊपर से नीचे तक देखा और कहां “अरे तू चोर भी है और चतुर भी” |

बुल्ला गुरु जी के चरणों में गिर गया और कहां मैं रब को पाना चाहता हूं, साईं ने कहा “बुल्लेया रब दा की पौणा , अदरो पुटणा ते उधर लोणा” बुल्ले शाह ने गुरु जी की प्रथम दीक्षा को अपने प्राणों में बसा लिया |  इन सीधे-साधे शब्दों ने बुल्ले को रूहानियत का सार समझा दिया | बुल्ले को समझ आ गया कि गुरु के कहने का मतलब है  अपने मन को संसार की तरफ से हटाकर परमात्मा की ओर मोड़ देने से रब मिल जाता है |

सतगुरु के दर्शन पाकर बुल्लेशाह बेखुद हो गए |  बुल्लेशाह को अपनी कोई सुध बुध न रहने लगी | 

बुल्लेशाह और  उनके मुरशद शाह इनायत की एक कथा और बहुत प्रचलित है, आइये जानते है क्या है वो वार्तालाप  :-

बुल्ले शाह की जीवनी(Bulle Shah Life History)

एक बार बुल्लेशाह की इच्छा हुई कि मदीना शरीफ की जियारत को जाएं | बुल्लेशाह  ने अपनी इच्छा गुरु जी को बताई |  शाह इनायत जी ने बुल्लेशाह से वहां जाने का कारण पूछा | बुल्लेशाह ने कहा वहां हजरत मोहम्मद का रोजा है और रसूल अल्लाह ने फरमाया है कि जिसने मेरी कब्र की जियारत की, उसने मुझे जीवित देख लिया | गुरु जी ने कहा कि इसका जवाब मैं 3 दिन बाद दूंगा |

गुरु जी के ऐसे कहने पर बुल्ले शाह ने अपने मदीने जाने का फैसला एक बार छोड़ दिया |  तीसरे दिन बुल्लेशाह ने सपने में हजरत रसूल के दर्शन किए | रसूल अल्लाह ने बुल्ले शाह से कहां तेरा मुरशद कहां है, उसे बुला लाओ | रसूल ने इनायत शाह को अपनी दाएं ओर बिठा लिया | बुल्लेशाह नजरें झुका कर खड़ा रहा | जब नजरें उठी तो बुल्ले को लगा कि रसूल और मुरशद की सूरत बिल्कुल एक जैसी है, वह पहचान ही नहीं पाया कि दोनों में से रसूल कौन है और मुरशद कौन है |




तब बुल्ला शाह जी कहते हैं

हाजी लोक मक्के नू जांदे
जित वल यार उसे वल काबा
भावें खोल किताबां चारे |



प्रेम मार्ग में छोटी सी बात नाराजगी का कारण बन जाती है | बुल्ले शाह की छोटी सी भूल के कारण उनका मुरशद नाराज हो गया | मुरशद ने बुल्ले शाह की क्यारीओं की तरफ से अपनी कृपा का पानी मोड़ लिया | बुल्ले शाह का प्रकाश अंधकार में और खुशी गमी में बदल गई |

आइए जानते हैं क्या कारण था कि शाह इनायत जी बुल्ले शाह से नाराज हो गए :-


कहते हैं बुल्ले के परिवार में शादी थी|  बुल्ले ने मुरशद को आने का न्योता दिया | शाह इनायत खुद तो गए नहीं, अपने एक मुरीद को भेज दिया | मुरीद फटे पुराने कपड़ों में शादी में पहुंचा | 

खुद को उच्च जाति का समझने वाला सैयद परिवार पहले ही नाखुश था | वह कैसे मुरशद के मुरीद का स्वागत करते हैं |  बुल्लेशाह भी शादी के जश्न में ऐसे खोए हुए थे कि मुरशद के बंदे को भूल गए | जब वह मुरीद लौटकर शाह इनायत जी के पास पहुंचा और सारा किस्सा सुनाया तो इनायत जी बुल्ले शाह के इस रवैया से नाराज हो गए | उन्हें बुल्लेशाह से यह उम्मीद नहीं थी | जब बुल्ले शाह अपने मुरशद शाह इनायत से मिलने गए, तो उनकी तरफ पीठ कर शाह इनायत ने ऐलान कर दिया मैं बुल्ले का चेहरा नहीं देखूंगा |

बुल्ले को गलती का एहसास हुआ, पर मुरशद तो नाराज था | बुल्ले ने बहुत समझाया शाह जी को परंतु मुरशद नहीं माने | बुल्ला मुरशद रांझे के लिए तड़पती हीर हो गया  | 

अपने मुरशद को मनाने के लिए उसने कंजरी से नाचना सीखा | खुद कंजरी बन पैरों में घुंघरू बांध लिए | नंगे पांव गलियों में निकल पड़ा | शाह इनायत को संगीत पसंद था | इसलिए बुल्ला संगीत में डूब कर खुद को भूल गया | एक पीर के उर्स पर जहां सारे फकीर इकट्ठे होते बुल्ला भी वहां पहुंच गया |

मुरशद से जुदाई की तड़प में बुल्ले ने खून के कतरे कतरे को निचोड़ देने वाली काफिया लिखी |  जब सब नाचने गाने वाले थक कर बैठ गए, तब  बुल्ला मुरशद के रंग में घंटों नाचता गाता रहा | उसकी दर्द भरी आवाज से, समर्पण से, मुरशद का दिल पिघल गया | मुरशद जाकर बुल्ले से पूछता है, तू बुल्ला है,

बुल्ला अपने मुरशद के पैरों में गिर गया बोला “मैं बुल्ला नहीं मैं भुल्ला(भुला हुआ) हां मुरशद ने बुल्ले को अपने सीने से लगा कर बुल्ले को जग के बंधनों से मुक्त कर दिया । अल्लाह की रेहमत में मिला दिया | इस प्रकार बुल्ले की सूखी कयारिओ को पानी मिल गया | बुल्ले शाह की आत्मा सतगुरु की आत्मा के रंग में डूब गई |दोनों में कोई भेद नहीं रहा| 

इस समय का बुल्ले शाह ने इस तरह वर्णन किया है:-


रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई
रांझा मैं विच मैं रांझे विच होर ख्याल न कोई ||
नी मै कमली यार दी कमली
नी मै कमली यार दी कमली…..


1757 में बुल्लेशाह ने अपना शरीर त्याग दिया और परमात्मा में लीन हो गए ।| पंजाब में और भी सूफी कवि हुए हैं लेकिन इनके जितनी श्रद्धा कोई प्रकट नहीं कर सकता | इन्होंने अपने मुरशद को सज्जन, यार, साईं, आरिफ, रांझा, शाह आदि नामों से पुकारा है |

BULLEH SHAH

बुल्ले शाह की जीवनी(Bulle Shah Life History)



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