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यीशु की पूरी ज़िन्दगी की कहानी (yishu life history story)

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यीशु को यीशु मसीह, ईसा मसीह, जीसस क्राइस्ट के नामों से जाना जाता है |  इसाई लोग यीशु को परमेश्वर का पुत्र मानते हैं | यीशु को इस्लामी परंपरा में भी एक महत्वपूर्ण पैगंबर माना गया है | बाइबल कुरान में भी इनका जिक्र आता है |

मान्यता के अनुसार ईसा की माता मरियम गैलीलियो प्रांत के गांव की रहने वाली थी | उनकी शादी दाऊद की राजवंशी युसूफ नामक बढ़ई से हुई थी | विवाह से पहले ही वह कुंवारी रहते परमेश्वर के आशीर्वाद से गर्भवती हो गई थी | ईश्वर ने अपने स्वर्गदूत भेजकर यूसुफ को कहा कि तुम्हारी पत्नी विवाह से पहले ही गर्भवती हो जाएगी | तुम उसका ध्यान रखना | इस प्रकार ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ ने मरियम को पत्नी स्वरूप स्वीकार किया  |

विवाह होने के बाद युसूफ गैलीलियो छोड़कर यहूदियों प्रांत के बेथलेहम नामक नगरी में जाकर रहने लगे | वहां ईसा का जन्म हुआ | यीशु को राजा हीरोज के अत्याचार से बचाने के लिए युसूफ मिस्त्र भाग गए, क्योंकि यीशु  जी जान को राजा से खतरा था । | राजा हीरोज  के निधन के बाद युसूफ लौटकर वापिस अपने गांव में बस गए |  

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ईसा जब लगभग 12 वर्ष का जब हुआ, उस वक्त की बात है यीशु के माता पिता हर वर्ष मेले में यरूशलेम जाया करते थे |  जब वह पर्व को मना कर वापस लौट रहे थे, तो यह उस वक्त उनके साथ ईसा नहीं था, माता पिता ने सोचा कि शायद वह दूसरे यात्रियों के साथ होगा | परंतु जब घर वापस लौटे तो उन्होंने यात्रियों से पूछा कि क्या ईसा तुम्हारे साथ है, तो उन्होंने कहा नहीं |

फिर वह यीशु को ढूंढते ढूंढते यरूशलेम वापस चले गए | 3 दिन ढूंढने के बाद यीशु एक मंदिर में उपदेश के बीच बैठे मिले | उनकी सुनते और उनसे प्रश्न पूछते | उनके परमात्मा के संबंध में इतने गुह्य प्रश्न पूछने पर सब लोग हैरान हो रहे थे | जब माता ने यीशु को देखा और कहां “पुत्र तूने हमसे क्यों ऐसा व्यवहार किया, देख मैं और तेरे पिता तुझे 3 दिनों से ढूंढ रहे हैं”

तब यीशु ने कहा आप लोग मुझे क्यों ढूंढ रहे थे ? क्या आपको नहीं पता कि मुझे अपने पिता के भवन में होना जरूरी है | परंतु उस वक्त यीशु ने जो बातें कहीं उस बात को यीशु के माता-पिता नहीं समझे और यीशु को वापस घर में ले गए




यीशु ने अपने पिता यूसुफ का पेशा सीख लिया था और लगभग 30 साल की उम्र तक उसी गांव में रहकर बे बढ़ई का काम करते रहे | 30 वर्ष की उम्र में ईसा ने यह यहुन्ना से दीक्षा ली |  कहते हैं तब ईसा पर पवित्र आत्मा आई | 40 दिन के उपवास के बाद ईसा ने लोगों को शिक्षा देनी शुरू कर दी |


धर्मगुरुओं ने यीशु का भारी विरोध किया | क्योंकि उन्हें अपने कर्मकांड से प्रेम था और यीशु कहते थे कि ईश्वर को पाने के लिए हमें किसी कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है | यीशु खुद को परमेश्वर का पुत्र मानते थे | इसलिए कट्टरपंथियों के कहने पर रोमी सैनिको ने यीशु को गिरफ्तार कर लिया | यीशु पर मुकदमा चलाया गया |
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वहां हाजिर सारे धर्मगुरु कहने लगे कि यीशु को जान से मार डाला मार डालना चाहिए | 

 अगले दिन शुक्रवार को सुबह होते ही जब यीशु को एक बड़े हाल में ले गए, वहां एक दूसरे से पूछने लगे कि यीशु के साथ क्या करना चाहिए ? तभी यीशु ने कहा कि मैं ईश्वर का पुत्र हूं | इस बार सैनिकों और कट्टरपंथियों ने, धर्मगुरुओं ने कहा कि यह धर्म का गलत प्रचार कर रहा है, इसे मृत्यु दंड मिलना चाहिए  | यीशु को कांटो का ताज पहनाया गया, पीठ पर क्रॉस उठवा कर उन्हें क्रूस पर लटकाया गया |   यीशु के दोनों तरफ एक एक मुजरिम को भी सूली पर लटकाया गया | उन्हें भी मौत की सजा मिली पर उसे तस्वीर में नहीं दिखाया गया है |

मान्यता के अनुसार यीशु आखरी बार अपने 12 वफादार चलो से से मिले, तो यीशु ने उनसे वादा किया, जब तुम पर पवित्र शक्ति आएगी, तो तुम ताकत पाओगे और दुनिया के सबसे दूर- दूर के इलाकों में मेरे बारे में गवाही दोगे |फिर देखते देखते वह ऊपर उठा लिया गया और एक बादल के जरिये से नजरो से छिपा लिया गया | इस तरह यीशु स्वर्ग लौट गए |
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प्रभु यीशु ने बहुत सारे चमत्कार किए थे |  कहते हैं कि यीशु जिसके सिर पर हाथ रख देते थे वह धन्य हो जाता था | यीशु ने इतने सारे पृथ्वी पर चमत्कार किए कि किसी और इंसान के लिए यह कर पाना नामुमकिन था |

30 साल की उम्र में यीशु ने लोगों को संदेश देना शुरू कर दिया |

उन्होंने कहा कि ईश्वर केवल एक है, वह प्रेम स्वरूप है, ईश्वर सभी मुल्कों को प्यार करता है | 

हमें सभी से प्रेम करना चाहिए, इंसान को क्रोध में आकर बदला नहीं लेना चाहिए | क्षमा करना सीखना चाहिए |

उन्होंने कहा कि वे ईश्वर के पुत्र हैं, वह मसीह है, वह स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग है | यीशु ने क्यामत के दिन पर खास जोर दिया | उन्होंने कहा कि स्वर्ग और नर्क इंसान की आत्मा को मिलेगा |


ईसा मसीह लोगों से कहते थे कि ईश्वर की आराधना करो | सब मनुष्य से प्यार करो, दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो | ह्रदय की सरलता और पवित्रता को महत्व देते थे  |



ईसाइयों का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इंसानों के पाप स्वयं पर ले लिए थे, इसलिए जो भी ईसा मसीह पर विश्वास करेगा उसे ही स्वर्ग मिलेगा |  मान्यता है कि मृत्यु के 3 दिन बाद ऐसा वापस जी उठे और 40 दिन बाद ही थे स्वर्ग चले गए | 


ईसा मसीह स्वयं परमेश्वर के दूत थे, हम सभी मनुष्य को पाप से बचाने के लिए जगत में देह धारण करके आए थे |  ईसा मसीह ऐसे थे जो बीमार, मूर्खों और सताए हुए लोगों का पक्ष लेते थे |

आइये अब जानते है ईसा की माँ मरियम के बारे में:-

मां मरियम 
परमेश्वर की ओर से जिब्राइल के स्वर्ग दूत आकर कुंवारी कन्या मरियम से मिले | उस समय मरियम की सगाई युसूफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरुष से हुई थी | स्वर्ग दूत ने आकर मरियम को बधाई दी और कहां तेरी जय हो, तुझे प्रभु का, ईश्वर का अनुग्रह हुआ है | प्रभु तेरे साथ है | नए काम के लिए प्रभु ने तुम्हें चुना है|

मरियम घबरा गई और सोच में पड़ गई कि यह क्या कह रहे हैं ? स्वर्ग दूतों ने कहा मरियम जितना हो परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है, परमात्मा के आशीर्वाद से तू गर्भवती होगी और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा जिसका नाम यीशु होगा | 

वह महान होगा | वह परमेश्वर का पुत्र कहलायेगा | वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा और उसके राज्य का कभी अंत न होगा |



ज्ञान एक ऐसा खजाना है जिसको जितना बांटते है उतनी दुगनी से बढ़ता है ।

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शुभ और नेक कामनाओ के साथ 

धन्यवाद्

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