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GURU RAVIDAS JI, SANT KABIR JI, GURU GORAKHNATH KATHA

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संत रविदास जी, कबीर जी और गुरु गोरखनाथ की कथा:-




गुरु गोरखनाथ जी पूरे भारतवर्ष में यात्रा करते रहते थे और उनके नाम से सब परिचित थे |  वे अलख निरंजन, अलख निरंजन शब्द का गुणगान करते रहते थे | एक बार घूमते घूमते गुरु गोरखनाथ जी कबीर दास जी की कुटिया पर पहुंचे | कुटिया में कबीर दास जी थे और उनकी बेटी कमाली थी | 

गोरख नाथ जी कुछ समय कबीर जी की कुटिआ में बैठे और परमात्मा की भक्ति का गुणगान करने लगे | तभी कबीर दास जी ने कहा चलो हम रविदास जी के पास चलते हैं | कबीर जी की बिटिया कमाली भी वहां बैठी थी | वह कहती पिताजी मैं भी चलूंगी, तो पिता ने कहा हां बेटी तुम भी चलना|  सब मिलकर श्री रैदास जी की कुटिया में जाते हैं |

जब वहां जाते हैं, तो वह देखते हैं कि संत रविदास जी की आंखों में प्रेम के आंसू आ गए हैं |  उस समय संत रविदास जी जूते बना रहे थे और अपने कठौती में से पानी ले ले कर उन्हें भिगो रहे थे |

तभी रविदास जी ने उस कठौती में से पानी लेकर कबीर जी और गुरु गोरखनाथ जी को पीने को कहा |

कबीर दास जी ने तो वह पानी पी लिया, परंतु गोरखनाथ जी सोचने लग गए की कैसे संत है, आने वाले मेहमान को यह अपने कठौती का, चमड़े का पानी पिला रहे है | उन्होंने मन में सोचा मैं यह पानी नहीं पियूंगा, तो उन्होंने रविदास जी को कहा कि मैं तो पानी पी कर आया हूं, मुझे प्यास नहीं लगी है, गोरखनाथ जी ने पानी पीने से मना कर दिया |

तो कबीर दास जी की बेटी वहां थी, बोली बाबा मुझे प्यास लगी है, मुझे पानी दे दो, तो रविदास जी ने पानी बेटी को दे दिया और कमाली सारे का सारा पानी पी गई |
वह पानी कोई साधारण पानी नहीं था, वे चरणामृत था, गंगाजल था |

अब उनकी भी थोड़ी देर प्रभु की चर्चा हुई, प्रभु की चर्चा के बाद भी सभी वापस जाने लगे | 

कबीर दास जी और उनकी बेटी वापस अपनी कुटिया में चले गए और गुरु गुरु गोरखनाथ जी वापस भारत भ्रमण पर निकल पड़े | 

काफी समय बाद एक दिन गोरखनाथ जी घूमते घूमते मुल्तान पहुंचे | उस समय मुल्तान भारतवर्ष में आता था, जो इस समय पाकिस्तान में है और मुल्तान में पहुंचकर गोरखनाथ जी आवाज लगा रहे थे, अलख निरंजन अलख निरंजन, अलख निरंजन |  गुरु गोरखनाथ जी के हाथ में खप्पर था (एक कटोरा था)  गुरु गोरखनाथ जी ने कहा कोई ऐसा है, जो मेरी इस खप्पर को भर दे | इस खप्पर को भर दे, कटोरा को भर दे | 

जैसे ही कोई इसमें राशन डालता था, तो वह खप्पर (कटोरा) सारा राशन खा जाता था | लोगों ने खप्पर में बहुत राशन डालने की कोशिश की, लेकिन  सारा राशन तुरंत खाली हो जाता |

तभी एक साधारण सी महिला वहां आई और पूछा बाबा क्या आप इस खप्पर को भरना चाहते है, तो उस महिला ने क्या किया, कि वे थोड़े से चावल लेकर आई और चावल उसने खप्पर में डाल दी |

जैसे ही वे चावल खप्पर में डाले तो खप्पर राशन से भर गया |

गुरु गोरखनाथ जी हैरान हो गए, कि आज तक तो किसी ने खप्पर को भरा नहीं, यह कोई साधारण महिला नहीं है, तो गुरु गोरखनाथ जी ने इस महिला को कहा कि, पुरे मुल्तान में खप्पर को कोई नहीं भर पाया, तुमने कैसे खप्पर को भर दिया | 

तो उस महिला ने कहा बाबा, आपने मुझे पहचाना नहीं, मैं कबीर दास जी की बेटी कमाली हूं, उन्होंने कहा ठीक है परंतु यह बता कि तूने खप्पर कैसे भरा |

तो उस बेटी ने कहा आपको याद है, एक बार मैं, पिताजी और आप संत रविदास जी की कुटिया में गए थे | वहां संत रविदास जी ने पानी पिलाया, पिताजी ने भी पानी पी लिया, आप ने मना कर दिया और वह पानी मैंने पी लिया | मेरी शादी हो गई है और मैं मुल्तान में आ गई हूं |

जब मैंने संत रविदास जी का पानी पिया, तो मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई, ये वही संत रविदास जी के पवित्र जल के कारण हुआ है । और उसी वजह से आपका खप्पर भर गया है । गुरु गोरख नाथ जी को पानी न पीने का पछतावा हुआ ।

उसी समय गुरु गोरखनाथ जी कबीर दास जी के पास गए और कहां रे कबीरा, रे कबीरा मुझे जल्द से जल्द संत रविदास जी के पास ले चलो | कबीर जी  और गुरु गोरखनाथ जी दोनों गुरु रविदास जी के पास चल दिए । 
अभी संत रविदास जी ने दरवाजा खोला और कबीर जी और गुरु गोरखनाथ जी, गुरु रविदास जी के पास जाकर बैठ गए | 

गोरखनाथ जी इंतजार करने लग गए कि आज हमें पानी कब पिलायेंगे | यह सब तो परमात्मा के गुणगान किए जा रहे हैं | 

तभी गोरखनाथ जी कहते हैं कि मुझे पानी पिलाइये, मुझे मैं पानी पीना है तभी संत रविदास जी कहते हैं, जब पिलाते थे, तब पिया नहीं, जिन पिया वह जान गया |

उन्होंने कहा अरे गोरखा हम तुम्हें उस दिन पानी पिला रहे थे, तुमने पिया नहीं, परंतु जिस ने पिया, उसने परमात्मा को जान लिया, वह पानी अब मुल्तान गया |
गुरु गोरखनाथ जी ने कहा धन्य है आप |

इस प्रकार कहा गया है की संतों के आसपास, जो भी समान है, वह सब तीर्थ धाम है, जैसे संत रविदास जी की भूमि तप भूमि है । गुरु रविदास जी की कठोती में गंगा बहती थी । 

धन्य है गुरु रविदास जी
धन्य है गुरु रविदास जी


SANT RAVIDAS AND MAA GANGA STORY




आपके लिए नेक और शुभ कामनाओ के साथ 
धन्यवाद

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