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SANT RAVIDAS AND MAA GANGA STORY

GURU RAVIDAS AND MAA GANGA STORY

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संत रविदास जी को विश्व के महान संतों में गिना जाता है | संत रविदास जी को रैदास के नाम से भी जाना जाता है | संत रविदास जी ने अपने ज्ञान द्वारा समूह भारत के लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया है | संत रविदास जी 15वीं सदी के एक महान कवि, भक्त, जन सुधारक रहे हैं | संत रविदास जी के जीवन से हमें धर्म, जाति ऊंच-नीच की भावना से उठकर प्रभु प्रेम में लीन रहने की प्रेरणा मिलती है |

संत रविदास जी के लिए कर्म और परोपकार ही पूजा था | संत रविदास जी संत कबीर के गुरु भाई थे,क्योंकि इनके गुरु रामानंद जी भी संत कबीर जी के गुरु हुए । 



आइये जानते है गुरु रवि दास जी और माँ गंगा की प्रचलित कथा :- 

एक बार संत रविदास जी जब जूते बनाने के काम में लीन थे | तभी एक ब्राह्मण उनके पास आए और कहा कि मेरा जूता बना दो, मुझे जल्दी है |

तो संत रविदास जी ने उस ब्राह्मण से पूछा कि आप कहां जा रहे हैं|

उस ब्राह्मण ने कहा कि मैं गंगा स्नान करने के लिए जा रहा हूं और उस ब्राह्मण ने संत रविदास जी को कहा तुम शूद्र क्या जानो कि गंगा स्नान क्या होता है |

संत रविदास जी ने कहा सही कहा ब्राह्मण जी, हम जैसे लोगों से तो पावन गंगा भी अपवित्र हो जाएगी | 

 ब्राह्मण ने संत रविदास जी को कहा, यह लो अपनी मेहनत की एक कौड़ी और मुझे मेरा जूता दो |

संत रविदास जी ने ब्राह्मण को कहा कि मेरी तरफ से यह गंगा मैया को भेंट कर देना | 

तब ब्राह्मण स्नान करने के लिए गंगा में चले गए । स्नान करने के बाद जब ब्राह्मण वापस आ रहा था, तो उसे ध्यान आया अरे उस शूद्र की कौड़ी तो गंगा जी को अर्पण की ही नहीं | उसने कोड़ी निकाली और गंगा तट पर खड़े होकर कहां, हे माँ गंगे संत रविदास की यह भेट स्वीकार करो,

तभी मां गंगा ने नदी में अपना हाथ प्रकट किया और कहां संत रविदास की यह कोड़ी मुझे हाथ में दे दो | 
इसके बाद ब्राह्मण हक्का-बक्का होकर वापस चलने लगा, तभी आवाज आई हे ब्राह्मण यह भेंट मेरी तरफ से संत रविदास जी को दे देना | गंगा मैया के हाथ में एक रतन जड़ित कंगन था, माँ गंगा ने कहा मेरी तरफ से ये कंगन संत रविदास जी को भेंट कर देना । 

ब्राह्मण उस कंगन को लेकर संत रविदास की ओर चल पड़ा | जाते जाते रस्ते में उस ब्राह्मण को लालच आ गया | ब्राह्मण ने सोचा कि संत रविदास को क्या पता कि गंगा मैया ने कंगन उसे भेंट किया है | अगर यह कंगन मै राजा की रानी को दूंगा, तो वह राजा मुझे मालामाल कर देगा |

तब ब्राह्मण राज दरबार गया और राजा को वह कंगन भेंट कर दिया | और राजा ने वो कंगन रानी को भेंट कर दिया । रानी देख कर बहुत खुश हुई, तभी ब्राह्मण अपना इनाम लेने के लिए सोच रहा था |

तभी रानी ने राजा को कहा कि मुझे ऐसा एक एक ओर कंगन चाहिए, तभी राजा ने इस ब्राह्मण को कहा कि हमें इस तरह का एक कंगन ओर चाहिए |

तो ब्राह्मण ने कहा आप अपने जोहरी से इस तरह का एक और कंगन बनवा लीजिये |

राजा ने कहा कि हमारे पास ऐसे रतन नहीं है, यह रतन हमारी राज्य में नहीं है | राजा बोले आप हमें इसी तरह का कंगन बनवा कर दीजिए |  तभी ब्राह्मण ने कहा महाराज इसका दूसरा कंगन नहीं मिल सकता, राजा को क्रोध आ गया, राजा ने कहा अगर तुम मुझे दूसरा कंगना नहीं ला कर दोगे, तो मैं तुम्हें मृत्युदंड दूंगा |

ब्राह्मण की आंखों से आंसू बहने लगे | संत रविदास जी के साथ किया गया छल उनके लेने वाला था | तब उस ब्राह्मण ने राजा को सारा सच बताया | उसने कहा कि संत रविदास ही है जो आपको ऐसा दूसरा कंगन लाकर दे सकते हैं |

राजा ने कहा मुझे संत रविदास जी के पास ले चलो | दोनों संत रविदास जी के पास गए | 

 संत रविदास जी भक्ति में लीन होकर जूतियां गांढ रहे थे | ब्राह्मण ने संत रविदास जी के चरण पकड़ लिए और अपने जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना की |

तभी राजा ने ब्राह्मण से जीवनदान के बदले दूसरा कंगन मांग लिया |




संत रविदास जी ने मां गंगा से प्रार्थना की, कि मां गंगा इस ब्राह्मण के जीवन दान के लिए मुझे दूसरा कंगन ला कर दें | तभी रविदास जी की पानी वाली कठौती में एक दूसरा कंगन प्रगट हुआ | 

और वह कंगन राजा को दे दिया । राजा और ब्राह्मण ने संत रवि दास को प्रणाम किया । 

ब्राह्मण ने संत रविदास जी से बुरी शब्दावली और किये गए छल के लिए क्षमा मांगी | तभी से यह बात प्रचलित है मन चंगा तो कठौती में गंगा | 

रविदास जी हमारे बीच में नहीं है परंतु उनके द्वारा बताए गए ज्ञान और भक्ति की  समाजसेवी की भावना से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं | 

संत रविदास जी का मानना था कि इंसान कभी भी जाति से महान नहीं बनता है, वह अपने किए हुए कर्मों के द्वारा, अपना जीवन जब दूसरों पर निछावर कर देता है, तब लोग उन्हें युगो युगो तक याद करते हैं |

संत रविदास जी कहते हैं यदि हमारा मन शुद्ध है, तो ही हमारे हृदय में परमात्मा निवास कर सकते हैं |
तभी कहते हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा | 

संत रविदास जी की जीवनी के लिए यहां क्लिक करे

SANT TULSI DAS JI


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